गुलज़ार शायरी

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gulzar poetry

गुस्सा भी क्या करूँ तुम पर,

तुम हँसते हुए बेहद अच्छे लगते हो!

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ख़ुद को कितना भुला दिया मैंने,

अपने आप को भी अब अजनबी सा लगता हू!

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छोटी सी उम्र में हमने भी एक गुनाह कर दिया,

दर्द सहने के बजाय लिखना शुरु कर दिया…!

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तुम्हे जो याद करता हुँ, मै दुनिया भूल जाता हूँ ।

तेरी चाहत में अक्सर, सभँलना भूल जाता हूँ ।।

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मैं किस्सा हूँ अनसुलझा सा,

अनसुलझी मेरी कहानी है,,

कुछ मेरे टूटे सपने हैं,

और कुछ उनकी मेहरबानी है,!.!

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जो बीत गई,फिर वही बात हुई,

मै मिला मुझी में कहीं,ना बात हुई,

ना मुलाकात हुई…!